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इंद्रियों के सहारे कविता को तलाशते केदारनाथ सिंह

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  08-Jan-2024 | आयुष्मान



तीसरे सप्तक के कवि केदारनाथ सिंह, राणा उदय प्रताप कॉलेज के प्राचार्य केदारनाथ सिंह, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर केदारनाथ सिंह। कितने ही तो परिचय हो सकते हैं एक व्यक्ति के। पर व्यक्ति अगर कवि हो तो परिचय बाहर तलाशना बेमानी है। उसे उसकी कविताओं में टटोलना चाहिए। कविता सबसे पहले और अंत में शब्द ही है। शब्द ही तय करेंगे कवि का मूल्य। केदारनाथ सिंह का परिचय क्या यह नहीं होगा जिसे एक कविता में वो कहते हैं -

मेरा होना
सबका होना है
पर मेरा न होना
सिर्फ़ मेरा होगा

कवि का मैं घुलकर सब में शामिल हो गया है। कवि अपनी अनुभूति के शिखर पर यही तो चाहता है। केदार की कविताओं में सबके लिए चिंता थी। केदार संवेदनाओं के कवि हैं। उनकी संवेदनशील की झलक ‘एक ज़रूरी चिट्ठी का मसौदा’ कविता में देखिए -

अन्त में लिखूँगा कि पृथ्वी के एक छोटे-से
नागरिक के नाते मेरा सुझाव है
कि हो सके तो हर एक धड़कन के साथ
एक अदृश्य तार जोड़ दिया जाए
कि एक को प्यास लगे
तो हर कंठ में जरा-सी बेचैनी हो
अगर एक पर चोट पड़े
तो हर आँख हो जाए थोड़ी-थोड़ी नम
और किसी अन्याय के विरुद्ध
अगर एक को क्रोध आए
तो सारे शरीर
झनझनाते रहें कुछ देर तक

हमने दुनिया में सरहदें बना रखी हैं। हमने चीज़ों को बाँटकर देखना शुरू कर दिया है। पर कवि इन सरहदों को नहीं मानता है। कवि किसी भाषा, जाति या देश का नहीं होता है। वह तो पूरी मनुष्यता का कवि होता

है। वह राष्ट्र के घेरे में बँधा नहीं होता है। कवि तो विश्व नागरिक है। ‘उसकी चुप्पी’ कविता को केदार की संवेदनशीलता के तौर पर देखना चाहिए।

‘गिलास के जल में
पूरा आसमान था
एक पूरी दुनिया थी
जहाँ हरेक की साँस में
हरेक की साँस की
आवाजाही थी।’

हर रचनाकार जब कुछ लिखता है तो उसके ज़हन में एक पाठकवर्ग होता है। यानी वह किसके लिए लिख रहा है। कौन इन कविताओं को पढ़ेगा? केदार नौकरी के चलते दिल्ली में रहते रहे लेकिन उनका गाँव उनसे छूट न सका। गाँव एक तीव्र भाव के साथ कविताओं में उमड़ता रहा। लेकिन केदार जानते थे कि वे तमाम लोग जो उनकी कविता में अनिवार्य संदर्भ की तरह आते हैं, वे उनको कभी नहीं पढ़ सकेंगे। एक संस्मरण में भाषा की सीमा बताते हुए कहते हैं कि हमारी भाषा ठेठ गाँव के आदमी के सामने सरेंडर कर देती है। केदार गाँव जाते हैं तो उनकी बेचैनी कविता में झलकती है। 'गाँव आने पर' कविता में वे लिखते हैं -

यही हैं मेरे लोग
जिनका मैं दम भरता हूँ भाषा में
और यही यही जो मुझे कभी नहीं पढ़ेंगे

पर कवि रास्ते खोजता है। इस खोज में वह उन आदिम तरीकों की तरफ़ मुड़ता है जिसके लिए किसी भाषा की आवश्यकता नहीं। तमाम भाषाओं के बावज़ूद उनका महत्व कम नहीं होगा। कवि इंद्रियों के सहारे कविता को महसूस करने की बात करता है। 'पोस्टकार्ड' शीर्षक से लिखी कविता को इस पूरे प्रयास की प्रस्तावना के तौर पर देखा जाना चाहिए।

'इसे कोई भी पढ़ सकता है
वह भी जिसे पढ़ना नहीं
सिर्फ़ छूना आता है'

केदार इस प्रयास को आगे बढ़ाते हैं। शब्दों से शब्दातीत होने की यात्रा करते हैं। शब्द एक आवाज़, गंध, स्पर्श और स्वाद में तब्दील हो जाते हैं। हम कई बार भाषा के सहारे नहीं बोलना चाहते हैं। तब हमारा स्पर्श ही कितना कुछ कहता है। 'दुनिया को तुम्हारे हाथ जितना सुंदर और गर्म होना चाहिए', ये रिश्ते की ऊष्मा है जिसे किसी और तरीके से व्यक्त नहीं किया जा सकता है। अनायास नहीं है कि उन्होंने 'इंद्रियबोध' शीर्षक से कविता लिखी है।

मैं आँखों से सोचता हूँ
कानों से देख लेता हूँ मैं
मेरी जीभ
एक अद्भुत स्वाद के साथ
चुपचाप सुनती रहती है
हर आवाज़ को
मेरी नाक
चूँकि इंतज़ार नहीं कर सकती
आने वाली ख़ुशबू का
इसलिए अक्सर तमतमाकर
हो उठती है लाल
और मैं
चूँकि ज्यादातर चुपचाप रहता हूँ
इसलिए ज्यादातर मेरा हाथ बोलता है
जब वह होता है
किसी दूसरे हाथ में

केदार के यहाँ ‘जमीन पकती है’और शब्द भी। कुछ भी अचानक में नही होता है। हर चीज़ की एक प्रक्रिया होती है। ये प्रक्रिया बिंबों के सहारे कविता में उतरती है।

‘शब्द कहीं पक न गये हों
ख़ुशबू यहीं से आ रही थी- मैंने कहा

‘रोटी’ कविता में केदार रोटी बनने की पूरी प्रक्रिया के बारे में कहते हैं। रोटी भूख का आदिम बिंब है। भूखे होने पर माँ की याद आती है। जब बच्चा बोल भी नहीं पाता तो रोते हुए माँ को पुकारता है। रोटी की याद के साथ माँ की याद जुड़ी है। माँ को खोजते हुए केदार चक्की तक जाते हैं।

‘पत्थरों की रगड़ और आटे की गंध से
धीरे-धीरे छन रही थी
माँ की आवाज़’

कवि चावल देखता है तो उसके दाने की ओर लौटता चाहता है। चावल बनने की प्रक्रिया में सबके प्रति कृतज्ञता जाहिर करना चाहता है। ‘एक छोटा-सा अनुरोध’ शीर्षक से लिखी कविता में कवि चावल बनने से पहले उसके दाने और उसकी सुगंध से मिलना चाहता है।

केदार की कविताओं में गंध की उपस्थिति रेखांकित करने वाली है। वे कई बार ऐसे बिंब गढ़ते हैं और तुरंत आपकी नाक उसको महसूस कर लेती है। बानगी के लिए ये देखिए -

‘जब वर्षा शुरू होती है
एक बहुत पुरानी-सी खनिज गंध
सार्वजनिक भवनों से निकलती है
और सारे शहर पर छा जाती है।’

गंध को जीवन के बिंब के तौर पर देखा जाना चाहिए। अगर गंध बची हुई है तो जीवन बचा हुआ है। ‘नदियाँ’ शीर्षक से लिखी कविता में गंध की तलाश दरअसल जीवन की तलाश है।

‘नदियाँ उन्हें देखती हैं
और जैसे चली जाती हैं कहीं अपने ही अंदर
किन्हीं जलमग्न शहरों की
गंध की तलाश में’

हम जगहों को उसकी गंध से भी पहचानते हैं। हमें अपने घर से एक परिचित गंध महसूस होती है। वह कैसी होती है हूबहू कहना मुश्किल है लेकिन उसकी उपस्थित है। केदार की कविताओं में ‘भूसे की ख़ुशबू ‘भी उसी तरह स्वाभाविक है जिस तरह रोटी की गंध। गंध के इस परिचय को ‘भारत की सीमा पर एक नेपाली शहर’ शीर्षक कविता में देखिए -

‘यहाँ कोई नहीं पूछता किसी से
कितने बजे हैं?
क्योंकि समय यहाँ
एक घास की गंध है
जिसे सब पहचानते हैं’
या ‘बाघ’ शीर्षक कविता में लकड़ी की गंध
एक बँगला था जहाँ से आ रही थी
किसी परिचित लकड़ी के
जलने की गंध
वह गंध बाघ को
सगोतिया की तरह लगी

आधुनिक शब्दावली में एक शब्द चलता है - क्रेविंग। जब हम किसी के स्पर्श, गंध आदि के लिए छटपटा उठते हैं। ये छटपटाहट तो केदार की कविताओं में भी है। उनकी कविताओं में उपस्थिति की गंध के साथ-साथ अनुपस्थिति की भी गंध है। जो व्यक्ति नहीं है और उसकी याद आती है तो उसकी गंध छा जाती है। ‘नींद’ शीर्षक से लिखी कविता को देखिए -

‘कोई था जो चला गया है
अपने नख और जबड़ों को छोड़कर
कोई नहीं था जिसके न होने की तीखी गंध
चारों ओर फैली हुई थी’

केदार अब हमारे बीच नहीं हैं। पर उनकी कवितायें हैं। उनकी छटपटाहट है। कुछ बचा लेने की ज़िद है। केदार जो महानगरों की रफ्तार में रम नहीं पाये। एक साक्षात्कार में वे कहते हैं - मेरे यहाँ जल्दी में कुछ नहीं होता। आपाधापी से भरे जीवन की भगदड़ में जब हम ठहरते हैं तो केदार की कविताओं की ओर लौटते हैं। कुछ ठहराव के लिए। उनके ‘न होने की गंध’ लगातार आती रहती है।



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