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विश्व में शरणार्थी संकट की स्थिति और समाधान

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  29-Jun-2023 | संकर्षण शुक्ला



शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त के अनुसार, शरणार्थी वो होता है जिसे उत्पीड़न, जंग या हिंसा के कारण अपने देश से भागने के लिए मजबूर किया गया हो और ऐसे में वो किसी दूसरे देश में रहने लगे हों। इसके साथ ही वो जिस देश में है, उन्हें वहां की नागरिकता हासिल ना हो और भय की वजह से उन्हें अपने देश वापस जाने की इच्छा भी ना हो। ऐसे लोगों को शरणार्थियों की संज्ञा दी जाती है। ऐसे लोग यदि दूसरे देश में रहने के इच्छुक हैं तो उन्हें वहां रहने की वजह साबित करनी होती है। इसके लिए शरणार्थी उस देश में आश्रयस्थान अर्थात शरण हेतु आवेदन करते हैं। यदि उनके आवेदन को शरणार्थी देश द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है तो उन्हें शरणार्थी का दर्जा मिल जाता है। यदि शरणार्थियों के वैश्विक आंकड़ो की बात करें तो शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त के अनुसार, दुनिया में सबसे ज्यादा शरणार्थी पांच देशों से आते हैं। और ये देश हैं- सीरिया, वेनेजुएला, अफगानिस्तान, दक्षिण सूडान और म्यांमार।

यदि शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त की बात करें तो यह दुनियाभर में शरणार्थियों के हितों की रक्षा के लिए समर्पित संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी है। संयुक्त राष्ट्र की इस एजेंसी की स्थापना वर्ष 1950 में की गई थी और इसका मुख्यालय जेनेवा में है। संयुक्त राष्ट्र अभिसमय, 1951 के अर्टिकल 2 के पैराग्राफ 1 में शरणार्थी की परिभाषा लिखी गयी है। ये परिभाषा शरणार्थी के दर्जे से जुड़े प्रोटोकॉल के तहत दी गई है, जो अंतर्राष्ट्रीय शरणार्थी कानून संधि का एक अहम हिस्सा है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी अभिसमय, 1951 शरणार्थी को एक 'ऐसे व्यक्ति' के रूप में परिभाषित करता है जो अपनी राष्ट्रीयता या अभ्यस्त निवास के देश से बाहर है, जिसे अपनी जाति, धर्म, राष्ट्रीयता, किसी विशेष सामाजिक समूह की सदस्यता या राजनीतिक राय के कारण सताए जाने का एक सुस्थापित भय है, और उत्पीड़न के डर से, उस देश की सुरक्षा के लिए, या वहां लौटने में वो असमर्थ या अनिच्छुक है।

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी अभिसमय, 1951, अक्टूबर 1967 को लागू किया गया था, भारत जिसका हिस्सा नहीं है। इसके जाहिर मायने हैं कि भारत शरणार्थियों को शरण देने के लिए बाध्य नहीं है। इसके बावजूद 1970 और 1990 के दशकों में भारत में बड़ी संख्या में अफगान शरणार्थी आए। इस वक्त देश में करीब 15,000 अफगान शरणार्थी रहते हैं। ऐसे में कह सकते हैं कि भारत ने एक अच्छे पड़ोसी होने के नाते हजारों की संख्या में अफगान नागरिकों को शरण दी है। चूँकि भारत में शरणार्थियों से जुड़ा न तो कोई कानून है और न ही कोई नीति है। विभिन्न रिपोर्टों की मानें तो इस समय भारत में लगभग 3 लाख शरणार्थी रह रहे हैं। इन शरणार्थियों को भारत सरकार कभी भी गैर कानूनी प्रवासी करार दे सकती है और फिर विदेशी अधिनियम या पासपोर्ट अधिनियम के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई कर सकती है।

यदि शरणार्थियों से संबंधित वैश्विक संकट की बात करें तो यह पिछली एक सदी का सबसे ज्वलंत मुद्दा रहा है। विभिन्न प्राकृतिक आपदाएँ जैसे- सुनामी, भूकंप, भूस्खलन, भू-धंसाव, समुद्र के जल स्तर का बढ़ना, सूखा, बाढ़ और जलवायु परिवर्तन आदि ने लोगों को अपने मूल स्थान से विस्थापित होने के लिए मजबूर किया है। इसके साथ ही विभिन्न मानवीय आपदाएँ जैसे- गृहयुद्ध, आतंकवाद, चरमपंथ, गरीबी, गैर-राज्य अभिकर्ताओं जैसे नक्सलवाद और माओवाद के कारण लोगों को अपने मूल निवास से सुरक्षित स्थान जाने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

गृहयुद्ध, आंतरिक अशांति, सत्ता संघर्ष और गरीबी के कारण लेबनान, सीरिया और लीबिया जैसे देशों के बहुत से नागरिकों को यूरोप में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है। चूँकि संसाधन तो सीमित हैं और जब उन पर अतिरिक्त जनसंख्या का बोझ पड़ता है तो वहाँ विभिन्न आर्थिक समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं। माँग की अधिकता के कारण चीजें महँगी हो जाती हैं जो अंततः स्थानीय लोगों पर बोझ बनकर टूटती हैं। इसके साथ ही कई बार इन देशों की लोकतांत्रिक पद्धति और खुलेपन से असहमत कुछ लोग धार्मिक कट्टरपंथ को भी बढ़ावा देते हैं। इसके साथ ही यहाँ शरणार्थियों के स्वागत संबंधी मुद्दे और उनकी वितरण संबंधी समस्याओं को भी उचित ढंग से संबोधित नहीं किया गया है। वर्ष 2021 में अफगानिस्तान में हुए सत्ता परिवर्तन के कारण भी यहाँ के शरणार्थियों की तादाद में इजाफा हुआ है।

भारत में स्थानीय स्तर पर यदि शरणार्थी समस्या की बात करें तो यह भी अपने पड़ोसी देशों जैसे बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, तिब्बत और म्यांमार से आने वाले शरणार्थियों की विकट समस्या से जूझ रहा है। वर्तमान में रोहिंग्या, चकमा-हाजोंग, तिब्बती और बांग्लादेशी शरणार्थियों के कारण भारत में मानवीय सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा, संसाधनों की कमी, पहले से और अधिक विकराल रूप धारण कर चुकी है। ऐसे में यह बेहद आवश्यक है कि भारत भी शरणार्थियों के संबंध में एक ऐसी स्पष्ट घरेलू नीति तैयार करे जो धर्म, रंग, नस्ल, भाषा और जातीयता की दृष्टि से तटस्थ हो तथा भेदभाव, हिंसा और रक्तपात की विकराल स्थिति से उबारने में कारगर हो।

शरणार्थियों से संबंधित कोई घरेलू कानून न होने के कारण दक्षिण एशियाई देशो में सर्वाधिक शरणार्थी भारत में ही रहते हैं। यहाँ शरणार्थियों से संबंधी कानून एवं नीति का अभाव है और मामले-दर-मामले के आधार पर शरणार्थियों से संबंधित मुद्दों को संबोधित किया जाता है। विभिन्न भारतीय कानून जैसे पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920, पासपोर्ट अधिनियम (1967), विदेशियों के पंजीकरण अधिनियम, 1939, विदेशी अधिनियम, 1946 और विदेशी आदेश (1948) शरणार्थियों से संबंधी मुद्दों का समाधान करने में विफल रहे हैं। अब जरूरत है कि भारत भी इस संबंध में एक सुस्पष्ट कानून और नीति तैयार करे।

यदि वैश्विक स्तर पर शरणार्थी संकट के समाधान हेतु नीतियों पर बात की जाए तो इस संबंध में प्रभावी उपाय किये गए हैं। इस परिप्रेक्ष्य में 'शरणार्थियों और प्रवासियों के लिए न्यूयॉर्क घोषणा' उल्लेखनीय है। इसे सितंबर 2016 में संयुक्त राष्ट्र शिखर सम्मेलन में अपनाया गया था। यह शरणार्थियों की रक्षा एवं उनके मानवाधिकार के साथ इनके पाल्यों(पुत्र और पुत्रियों) के शिक्षा संबंधी अधिकारों को भी सुनिश्चित करती है। इसके तहत शरण देने वाले देश को शरणार्थियों के आगमन के कुछ महीनों के भीतर ही इनके बच्चों की शिक्षा संबंधी इंतज़ामात करने पड़ते हैं। इसके साथ ही यौन एवं लिंग आधारित हिंसा को रोकने के लिए पर्याप्त प्रावधान भी करने पड़ते हैं। न्यूयॉर्क घोषणा, शरणार्थियों को शरण देने वाले देशों के प्रति जिम्मेदारी और जवाबदेही भी तय करती है। इसके अनुसार शरणार्थियों को शरण देने वाले देश की आर्थिक और सामाजिक उन्नति के लिए सकारात्मक प्रयास करने चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी अभिसमय, 1951 भी शरणार्थियों को पर्याप्त सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान करता है। इसके अंतर्गत विस्थापितों और शरणार्थियों को मूलभूत और जरूरी मानवाधिकार प्रदान किये जाते हैं- शरण देने वाले देश द्वारा सुरक्षा का अधिकार, विस्थापितों को निष्कासित न करने का अधिकार, अभिसमय के तहत अनुबंधित देश द्वारा शरणार्थियों को अवैध प्रवेश पर दंडित न करना, इसके साथ ही शरणार्थियों को रोजगार का अधिकार, आवास-शिक्षा-भोजन और अन्य मूलभूत जरूरतों आदि का अधिकार प्रदान करना। इसके अलावा भी यह अभिसमय शरणार्थियों को वास्तविक और सच्चे लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे धर्म की स्वतंत्रता, अपने देश के भीतर अदालतों तक पहुँच और अपने क्षेत्र के भीतर आंदोलन की स्वतंत्रता आदि को भी सुनिश्चित करता है। यह अभिसमय शरणार्थियों को मेजबान देश में पहचान और यात्रा दस्तावेज भी उपलब्ध कराता है।

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त(United nation high commissioner for refugees) द्वारा ‘स्टेप विद रिफ्यूजी’ (Step With Refugee) अभियान का भी प्रारंभ किया गया है। इसका उद्देश्य शरणार्थी परिवारों को सुरक्षित रखने के लिये कार्य करना तथा उनके जुझारूपन और दृढ़ संकल्प का सम्मान करना है। इस अभियान में भाग लेने वाले प्रतिभागियों द्वारा एक वर्ष यानी 12 महीनों में दो बिलियन किलोमीटर की दूरी तय करने के लिये स्वयं को चुनौती दी जाएगी क्योंकि विश्व में शरणार्थियों द्वारा अपनी सुरक्षा के लिये हर वर्ष लगभग इतने किलोमीटर की यात्रा तय की जाती है। इस अभियान में भाग लेने वाले व्यक्ति पैदल चलकर, साइकिल चलाकर या दौड़कर शामिल हो सकते हैं तथा फिटनेस ऐप फिटबिट, स्ट्रवा या गूगलफिट के माध्यम से भी आंदोलन में शामिल हो सकते हैं और वे जितने किलोमीटर तक यात्रा करेंगे वह अभियान में अपने आप जुड़ जाएगा। इस अभियान में भारतीय भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। अब जरूरत है कि भारत सरकार भी संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी अभिसमय, 1951 से सुसंगत एक राष्ट्रीय नीति बनाए।

  संकर्षण शुक्ला  

संकर्षण शुक्ला उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले से हैं। इन्होने स्नातक की पढ़ाई अपने गृह जनपद से ही की है। इसके बाद बीबीएयू लखनऊ से जनसंचार एवं पत्रकारिता में परास्नातक किया है। आजकल वे सिविल सर्विसेज की तैयारी करने के साथ ही विभिन्न वेबसाइटों के लिए ब्लॉग और पत्र-पत्रिकाओं में किताब की समीक्षा लिखते हैं।



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