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कैसी होगी बिना इंटरनेट की दुनिया

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  02-Aug-2023 | राहुल कुमार



इंटरनेट आधुनिक मानव सभ्यता की सबसे बड़ी देन है। यह उन गिने-चुने साधनों में से एक है जिनके बलबूते मनुष्य आए दिन तमाम क्षेत्रों में इतिहास रच रहा है। इसके महत्व को देखते हुए ही देश-दुनिया के सुदूर इलाके में भी इसकी पहुँच को संभव बनाया गया है। ई-कॉमर्स, टेलीमेडिसिन, शिक्षा, शोध, मनोरंजन इत्यादि के लिए इंटरनेट रीढ़ बन चुका है। वर्तमान में इससे अछूती न कोई गतिविधियाँ हैं और न कोई देश! ‘फहीमा शिरीन बनाम केरल राज्य, 2019’ के मामले में केरल उच्च न्यायालय ने संविधान के ‘अनुच्छेद 21’ के तहत इंटरनेट के उपयोग के अधिकार को निजता के अधिकार और शिक्षा के अधिकार का हिस्सा बनाते हुए मौलिक अधिकार घोषित किया।

संपूर्ण विश्व को एक करने में इंटरनेट की भूमिका अतुलनीय है। मोबाइल ऐप, वेबसाइट, सोशल मीडिया और यूट्यूब ने हर किसी को जागरूक किया है। ‘सीखने और जानने की भूख को इंटरनेट ने खूब बढ़ाया है। “सरकारें चाह भी लें तो पारदर्शिता पर पर्दा डाल नहीं सकती! क्यों, कब, कैसे, कहाँ, क्या और कौन का उत्तर इंटरनेट पर यूँ-ही तैरने लगता है।” यानी दुनिया की तमाम सरकारें इंटरनेट के कारण सुशासन और जवाबदेह वाली प्रारूप में आने को विवश हुई हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ‘अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ, 2020’ के मामले में कहा कि इंटरनेट सेवाओं का एक अपरिभाषित प्रतिबंध अवैध होगा और इंटरनेट बंद करने के आदेश संबंधी आवश्यकता और आनुपातिकता के परीक्षणों को पूरा किया जाना चाहिए। यानी इंटरनेट मनुष्य के लिए वायु, जल, जमीन के बाद चौथी मूलभूत आवश्यकता बन गई है।

इंटरनेट को मनुष्य ने ईजाद किया अब इंटरनेट से मनुष्य के लिए सुशासन, सूचना तक आसान पहुँच, अधिकारों की रक्षा, जागरूक होने की चाह, सशक्तिकरण, रोजगार की प्राप्ति और विभिन्न अवसरों की तलाश इच्छानुसार पूरी हो रही है। यह ज़रूरतों की भी ज़रूरत है, इस एक माध्यम से मनुष्य ने वो हासिल कर लिया है जिसमें विभिन्न समस्याओं और चुनौतियों का समाधान समाहित है। यदि कल्पना करना ही पड़े तो- “किसी चलते-फिरते इंसान का हाथ-पैर तोड़कर व्हील-चेयर पर बैठा देने के बराबर होगी बिना इंटरनेट की दुनिया।” सबकुछ ठप पड़ जाना और चौपट हो जाना सबकुछ का- समझते हैं आप; पहली नज़र में वैसी ही होगी बिना इंटरनेट की दुनिया! पानी, बिजली, मानवाधिकारों और मूल अधिकारों के लिए जितना त्राहिमाम नहीं होता है उससे कहीं अधिक त्राहिमाम इंटरनेट की वापसी के लिए होगा! इंटरनेट शटडाउन होने पर हमारी स्थिति क्या हो जाती है, गौर किया है आपने? जबकि पता होता है कि फिर से इंटरनेट बहाल हो जाना है इसके बावजूद जिस बेचैनी में चले जाते हैं हमलोग उसी से अंदाजा लगाया जा सकता है बिना इंटरनेट की दुनिया का!

वैसे, बिना मानसिक-बौद्धिक मशक़्क़त की ज़िन्दगी कितनी अच्छी लगती है! ज़्यादा एफर्ट न लगाना पड़े तो कितना मज़ा आता है! मोबाइल अथवा कंप्यूटर के सहारे पूरी दुनिया से रूबरू हो जाने में जो आनंद हमें आता है, वह आनंद विभिन्न समाजों, किताबों, अख़बारों और चिंतन-मनन-मंथन, तर्क-वितर्क में कहाँ! “जो सुकून किसी कंटेंट को कट-कॉपी-पेस्ट करने में है वह कलम घिसने में कहाँ! इंटरनेट आदत, लत, आभूषण सबकुछ बन चुका है।” कई बार तो मज़ाकिया तौर पर बोला भी जाता है कि ज़िन्दगी और नौकरी खोने का उतना डर नहीं है जितना डर मोबाइल खोने का है। हमने जाने-अनजाने में स्मार्टफोन में अपना अतीत, वर्तमान और भविष्य सबको अपलोड कर दिया है। दरअसल नई पीढ़ी को संवेदनशील मुद्दे पर लोड लेने में विश्वास नहीं रहा है, उनमें सोशल मीडिया पर खुदको अपलोड करने में विश्वास जगा हुआ है। “ज्ञान, जानकारी, समझ और संस्कार को अप-टू-डेट न करेंगे किंतु व्हाट्सअप स्टेटस, रील्स और साइबर बुलिंग में खूब दिलचस्पी लेंगे।” इंटरनेट हमें बहुत कुछ दे रहा है लेकिन हममें से ऐसे-ऐसे गुणों को डिलीट कर रहा है कि लेने के देने पड़ रहे हैं।

“मनुष्य और जानवर में एक अंतर यह है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं के लिए आविष्कार कर सकता है, और एक अंतर यह है कि मनुष्य अपने ही आविष्कारों का गुलाम हो जाता है।” यदि गुलाम न भी हो तो भी कम से कम उन आविष्कारों का अपने ही मनुष्य जाति के लोगों के प्रति गलत उपयोग तो ज़रूर करता है। एक समय के बाद आविष्कार हमें लीड करने लगता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इंटरनेट ने मनुष्य को शक्तिमान बनाया है लेकिन इस बात में भी सच्चाई है कि इंटरनेट के गलत इस्तेमाल ने हमारे दिलोदिमाग़ और समाज में ज़हर बोया है। जिस सुख-शांति, खुशहाली, मानवता, नवाचार और रचनात्मकता की हम सार्वजनिक मंचों से वकालत करते हैं उन्हीं को हम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से नेस्तनाबूद करने में डटे रहते हैं। साइबर बुलिंग, फेक न्यूज़, ऑनलाइन ट्रोल, ऑनलाइन गुटबाजी, ऑनलाइन जासूसी इत्यादि ऐसे शब्द हैं जिनकी एक अलग दुनिया है। इस दुनिया के प्राणी इन सब चीज़ों के आदी हो चुके हैं। उन्हें इनमें मज़ा आता है। अनेकों रिपोर्ट बता चुके हैं इंटरनेट किस तरह खतरा पैदा कर रहा है। अविकसित और विकासशील समाज में तो यह बम-गोला, बारूद की तरह इस्तेमाल होता है; डेटा चोरी, निजता का हनन और अपवाह फैलाकर ‘मॉब-लिंचिंग’ तक को अंजाम दिया जाता है।

मेरी नज़रों में- कई वजहों से बिना इंटरनेट की दुनिया शांतिपूर्ण होगी; उस दुनिया में मित्रता, बंधुता, मानवता और समरसता अपने नेचुरल रूप में होगी। “गति के साथ ठहराव ज़रूरी है, तरक्की के साथ अच्छाइयों और सच्चाइयों से लगाव ज़रूरी है, उड़ान के साथ ज़मीं से जुड़ाव ज़रूरी है; बिना इंटरनेट की दुनिया हमें मौका देगी पुनः ठहराव, लगाव और जुड़ाव का।” क्योंकि तब न ‘वायरल’ होने की भूख रहेगी और न ‘लीक’ होने का डर! किसी के इनबॉक्स में जबरदस्ती घुसने के हठ भी ख़त्म हो जाएंगे, ब्लॉक-अनब्लॉक करना भी होगा तो रियल ज़िन्दगी से: न कि व्हाट्सअप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर इत्यादि पर! तब व्यक्ति लाइक्स, शेयर, सब्स्क्राइब, कमेंट्स और फॉलोअर्स में न पड़ेंगे! बिना इंटरनेट वाली दुनिया में व्यक्ति का परिचय सोशल मीडिया अकाउंट से न होकर उनकी अपनी शिक्षा, समाज और राष्ट्र के प्रति दृष्टिकोण एवं उनकी अपनी मौलिक समझ से होगी। “इंटरनेट ने हवा-हवाई बुद्धिजीवीयों का हुजूम खड़ा किया है। कॉपी, कट, एडिट एंड पेस्ट वाले ये बुद्धिजीवी बिना इंटरनेट की दुनिया में साहित्य, इतिहास, विज्ञान, दर्शन और अन्य विषयों की पुस्तकों को पढ़ने की ओर लौटेंगे।” पुस्तकालयों में पुस्तकों के पृष्ठों पर जमी धूल हटेगी। न जाने कितनी सुंदर बनेगी बिना इंटरनेट की दुनिया!

“हर समृद्धि की क़ीमत चुकानी पड़ती है, रास्ते का हर रोड़ा पीड़ा नहीं देता!” इंटरनेट का खामियाज़ा हमलोग अब भी भुगत रहे हैं और तब भी भुगतेंगे। किंतु इससे लाभ का अंदाजा आप रुपये, डॉलर, पाउंड इत्यादि में नहीं लगा सकते हैं। जिस तरह हमलोग मोबाइल, कंप्यूटर और अन्य डिवाइस में रिसेट करते हैं ताकि वह सही से अपने मूल प्रारूप में आकर कार्य करे उसी तरह इस दुनिया में भी रिसेट करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। और इनकी शुरुआत यदि इंटरनेट से हो तो क्या हर्ज है! मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि बिना इंटरनेट की दुनिया मनुष्य को मशीन से पुनः मनुष्य बना देगी। खामियाँ और कमियाँ तो दूर होगी ही, क्या पता साथ में कुछ अन्य गुणों / सद्गुणों का विकास एक अलग किंतु बेहतरीन सभ्यता की नींव रख दे!

दरअसल हमारी और आपकी ज़िन्दगी से यदि हमारे कोई अपने चले जाते हैं, यह जानते हुए भी कि उनका लौटना असंभव है तो क्या हम जीना छोड़ देते हैं; दुख होता है- तक़लीफ़ होती है, आँसू के फव्वारे छूटते हैं किंतु कुछेक महीनों-वर्षों में हम सहज हो जाते हैं। उत्पत्ति के बाद नाश- सबसे बड़ा सच है। इंटरनेट अजर-अमर नहीं है। ‘सिंधुघाटी-सभ्यता’ कितनी विकसित थी, यदि उनके अक्षरों को पढ़ पाते हमलोग तो पता चल पाता कि वे कई मामलों में हमसे भी उन्नत थे- लेकिन क्या हुआ उनका; गर्त में समा गई न वह सभ्यता, वही होना है हमलोगों का भी। “तरक्की की भी सीमा होती है, मशीनीकरण की भी एक परिधि होती है, विज्ञान, तकनीक और प्रौद्योगिकी जब मानव अस्तित्व पर चिंगारी पैदा करने लगे तब संभल जाना चाहिए।” आर्थिक प्रगति की चकाचौंध में नैतिक प्रगति के पतन को कब तक तर्कसंगत ठहराते रहेंगे हमलोग? बिना इंटरनेट की दुनिया की शुरुआत बेचैनी और अनिंद्रा वाली होगी किंतु अंजाम सुकून भरा होगा।

यह तय है कि बिना इंटरनेट वाली दुनिया में अर्थव्यवस्था और सिस्टम लुढ़क जाएगा। बेरोजगारी, गरीबी और अशिक्षा में बेतहाशा वृद्धि देखने के लिए मिलेगी। इसके साथ-साथ मानसिक रूप से बीमार लोगों की तादाद भी बढ़ेगी। क्योंकि इंटरनेट एडिक्टेड लोग स्वीकार ही न कर पाएंगे कि उनके पंख हमेशा के लिए कट गए हैं। ऐसे लोगों में अजीब किस्म की छटपटाहट देखी जाएगी। इस वजह से कुछ दिनों/महीनों/वर्षों के लिए अपराध बढ़ सकता है किंतु जब धीरे-धीरे इंटरनेट के दीवाने लोग इंटरनेट की आभासी दुनिया से मुक्त होने लगेंगे तब समाज में असली संचार का दौर शुरू होगा। वह संचार, इस संचार क्रांति से अलग और अनोखा होगा। दुनिया तब अलग तेवर में पटरी पर लौटेगी। बिना इंटरनेट की दुनिया की शुरुआत बहुत संतुलित होगी क्योंकि दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है।

जैसे पतझड़ के ख़त्म होने का इंतज़ार चिड़ियाँ बेसब्री से किया करती हैं शायद वैसा ही इंतज़ार हमारे दादा-दादी, नाना-नानी, काका-काकी और माता-पिता इंटरनेट के ख़त्म होने कर रहे होंगे! इन्हें वास्तविक जीवन के रंग लुभाते हैं न कि कंप्यूटर और मोबाइल के स्क्रीन। ज़रा सोचिए- यदि घर के आँगन में मोबाइल के रिंगटोन की जगह फिर से दादी-नानी-माँ की लोरियाँ गूँजने लगे तो क्या होगा! मीडिया, नेता, शिक्षक और तमाम इनफ्लूएंसर्स यूट्यूबर की भूमिका से वापस लौटकर अपने प्रोफेशन के साथ न्याय करते हुए दिखेंगे तो क्या होगा! दरअसल बिना इंटरनेट की दुनिया में व्यक्ति के पास समय की कोई कमी न होगी। पैकेट में पैसे कम होंगे किंतु स्व-मूल्यांकन, आत्म-उत्थान और आत्मनुशासन का मौका ठीक-ठाक मिलेगा। तब सामाजिक गतिविधियों में बुजुर्गों, वयस्कों के साथ-साथ युवा भी हिस्सा लेंगे। “रिश्ते, रजनीति और प्रतिस्पर्धा के मैदानों में खटास के युग का अंत होगा।”

दरअसल मनुष्य ने विकास के क्रम में वो सबकुछ हासिल किया जो उन्हें सुपरमैन साबित कर सकता था। सबसे पहले मूलभूत ज़रूरतों को पूरा किया उसके बाद छोटी-मोटी कल्पनाओं को मूर्त रूप दिया और बाद में विज्ञान-प्रौद्योगिकी पर सवार होकर अंतरिक्ष में उड़ान भरा! सब ठीक था, कोई परेशानी न थी। किंतु जैसे ही हमने खुदके ऊपर तकनीक को हावी होने दे दिया- हम आधुनिक मानव होकर भी तकनीक के गुलाम होते चले गए। यह गुलामी इतनी खतरनाक है कि इनमें हमें मज़ा आने लगा। इंटरनेट के साथ रिश्ता हमारा इतना गहरा होता गया कि दुनियाभर के अरबों लोग इसे जन्म-मरण से जोड़कर देखने लगे। आभासी दुनिया में खोये रहने वाले इंसानों ने असली दुनिया से संवाद करना ही छोड़ दिया है। “मशीन और इंसान में फर्क होता है, यह फर्क इंसानों ने भूला दिया है; बिना इंटरनेट की दुनिया में कायदे से इसका फर्क सबको पता चल पाएगा। और इसका लाभ अंततः इंसान को ही होगा।”

अनोखी बात यह भी हो सकती है कि बिना इंटरनेट की दुनिया में वैज्ञानिक इंटरनेट से भी कुछ बढ़िया और उम्दा आविष्कार शायद कर ले जाए! यह भी संभव है कि उस आविष्कार में इंटरनेट की तुलना में मिलने वाला लाभ कई गुना बढ़ा हो जबकि हानि कई गुना कम कर दी गई हो! दरअसल तकनीक और प्रौद्योगिकी की रचना उतना कठिन भी नहीं है। इंसान का मस्तिष्क इतना लाजवाब और दिलचस्प है कि आवश्यकता के अनुकूल कुछ न कुछ गढ़ ही लेता है। याद कीजिए- हमारे पूर्वज कंदमूल, फल, जड़ और कच्चा मांस खाना, वनस्पति की पत्तियों और जानवरों के खाल को पहनते थे। उन्होंने पत्थरों की टक्कर से आग पैदा की, पहिया बनाया और धीरे-धीरे उनमें सामाजिकता और बौद्धिकता आई तब उन्होंने गाँव और शहर बसाया। विकास क्रम में वो सब होता चला गया जो मानव मस्तिष्क सोच रहा था। आज हम अन्य ग्रहों पर मानव बस्ती को बसाने के बारे में इसलिए सोच पा रहे हैं क्योंकि हमने अपने मस्तिष्क की क्षमता को सीमित न किया है। इंटरनेट मानव मस्तिष्क का केवल एक उत्पाद भर है। इसके न होने पर इसका तोड़ भी मनुष्य मस्तिष्क निकाल ही लेगा। या फिर यह भी हो सकता है जब तकनीकी और प्रौद्योगिकी विकास पूर्णतः चरम पर पहुँच जाएगा तब मानव सभ्यता का क्रमबद्ध पतन होना शुरू होगा। उन्हीं पतनों में इंटरनेट का न होना भी एक पतन होगा।

सच कहूँ तो स्मार्ट क्लास, वर्क फ्रॉम होम, फ्री लांसिंग, टेली-मेडिसिन, कोर्ट की ऑनलाइन सुनवाई, OTT प्लेटफॉर्म, जनहित में सरकार के अनेकों मोबाइल ऐप और वेब-पोर्टल, सैकड़ों ऑनलाइन स्टडी इनिशिएटिव, कोरोना काल/आपदा के दौरान इनकी उपयोगिता और तमाम वैज्ञानिक शोधों में इंटरनेट की भूमिका इत्यादि को देखकर लगता है कि इंटरनेट के बिना दुनिया में हाहाकार मचना तय है। दुनिया सूचना क्रांति से आगे निकलकर डिजिटल वर्ल्ड का रूप ले रही है। पेपरलेस विधानसभा, पेपरलेस पार्लियामेंट और पेपरलेस कोर्ट से लेकर पेपरलेस थाने जैसे बेहतरीन इनिशिएटिव लिए जा रहे हैं। बच्चों के किताबों का बोझ कम करने हेतु उन्हें कंप्यूटर और टैब दिए जा रहे हैं। इस स्थिति में इंटरनेट का हमेशा के लिए गायब हो जाना बहुत बड़े खतरनाक किंतु क्रांतिकारी बदलावों को न्योता देगा। संपूर्ण विश्व को एक कर देने में सक्षम इंटरनेट का लापता हो जाना छोटी घटना तो नहीं ही होगी किंतु उस घटना के बाद की दुनिया की कल्पना करना भी कम जिज्ञासापूर्ण नहीं है।

सार यह है कि इंटरनेट को उतना ही हावी होने दें, जितने से ज़िन्दगी आसान हो! हमें इसके बिना भी जीना सीखना चाहिए। कुछेक महीनों/वर्षों के लिए कम से कम सोशल मीडिया से दूरियाँ बनानी ही चाहिए। पुस्तकालयों, धरोहर-स्थलों और खेत-खलिहानों जैसे अनेकों गंतव्य हैं जहाँ पहुँचकर हम खुदको क़ायदे से अप-टू-डेट कर सकते हैं। कहीं ऐसा न हो कि आने वाले कुछ दशकों में ही इंटरनेट हमें अलविदा कह दे और हम मोबाइल को ऑन-ऑफ करते-करते तथा कंप्यूटर के की-बोर्ड को पीटते-पीटते किसी बड़ी बीमारी को आमंत्रित कर लें! हालाँकि फिलहाल ऐसा कुछ होने वाला नहीं है, फिर भी सोशल मीडिया पर फर्जीवाड़ा फ़ैलाने अथवा झेलने से अच्छा है कि खुदको तराशने और निखारने के लिए खुदके ऊपर समय का ज़्यादा से ज़्यादा निवेश हो…

  राहुल कुमार  

राहुल कुमार, बिहार के खगड़िया जिले से हैं। इन्होंने भूगोल, हिंदी साहित्य और जनसंचार में एम.ए., हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा तथा बीएड किया है। इनकी दो किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये IIMC से पत्रकारिता सीखने के बाद लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।



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