दुग्ध उत्पादन गरीबी उन्मूलन में कैसे सहायक हो सकता है?
« »14-Jun-2023 | राहुल कुमार
विकासशील देश होने के नाते भारत में गरीबी अभी भी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। विभिन्न लोक-कल्याणकारी योजनाओं और सब्सिडी के द्वारा आज़ादी के बाद से ही गरीबी उन्मूलन के लगातार प्रयास किए गए हैं। “रहने के लिए सबके पास घर हो, पहनने के लिए वस्त्र हो, खाने के लिए भोजन हो और आत्मनिर्भर बनने के लिए शिक्षा के साथ रोजगार हो; तभी विकसित भारत की कल्पना स्वीकार हो सकती है।” इस कल्पना को सच करने के लिए गाँव को सँवारने की जरुरत है।
“शहर तो आर्थिक, शैक्षणिक और प्रौद्योगिकी के दृष्टिकोण से जगमगा ही रहा है किंतु गाँव अब भी कमोबेश लड़खड़ा रहा है। गाँव को ताकत देकर ही भारत को ताकत दी जा सकती है।” पशुपालन और कृषि वे समाधान हैं जिनसे भारत की गरीबी काफी हद तक दूर हो सकती है क्योंकि भारत के अधिकांश नागरिक गाँव में ही निवास करते हैं। पशुओं से प्राप्त दूध और इनपर आधारित उद्योगों/डेयरी से शहरी गरीबी भी कम होती है। यानी दुग्ध उत्पादन गरीबी से बाहर निकाल सकता है।
दरअसल भारत सदियों से कृषि और इनसे संबंधित उद्योगों के लिए जाना जाता रहा है। भारतीय किसान खेती-किसानी के साथ-साथ पशुपालन भी करते रहे हैं। दूध देने वाले पशुओं में मुख्य रूप से गाय और भैंस का पालन किया जाता रहा है। भेड़ और बकरी के दूध में औषधीय गुण होने के कारण इनके दूध की डिमांड बहुत है। “भारत पशुधन और दुग्ध उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान रखता है। यही कारण है कि गरीबी उन्मूलन के लिए इस क्षेत्र की तरफ उम्मीद-भरी निगाहों से देखा जाता रहा है।” रोजगार की कमी से जूझते हुए गाँवों के लिए पशुपालन वरदान साबित होता रहा है। इसलिए आज़ादी के बाद से ही भारत में पशुधन के लिए विशेष प्रावधान लगातार किए जाते रहे हैं। ग्रामीण बेरोजगारी, गरीबी और भुखमरी को कम करने में दुधारू पशुओं का योगदान अतुलनीय है।
गौरतलब है कि भारत में श्वेत क्रांति से न सिर्फ दुग्ध उत्पादन में जबरदस्त वृद्धि हुई थी बल्कि गरीबी उन्मूलन को भी बल मिला था। श्वेत क्रांति वर्गीज कुरियन के दिमाग की उपज थी। भारत में श्वेत क्रांति की शुरुआत साल 1970 में हुई, इससे डेयरी इंडस्ट्री में काफी बदलाव आया और गरीब किसानों एवं युवाओं को रोजगार मिला। इस कार्यक्रम के कारण देश में स्वस्थ जानवरों की संख्या में वृद्धि हुई। दुग्ध उत्पादन के लिए मॉडर्न टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाने लगा। जिससे भारत दुनिया में सबसे ज्यादा दुग्ध उत्पादन करने वाले देशों की श्रेणी में शामिल हो गया। साल 1970 से 1996 तक कुल तीन चरणों में संपन्न हुई यह क्रांति सच में गरीबों के लिए वरदान साबित हुई। वस्तुतः “ऑपरेशन फ्लड कुछ और नहीं बल्कि गरीबी हटाने का ऑपरेशन साबित हुआ।” क्योंकि ऑपरेशन फ्लड का मुख्य उद्देश्य- दुग्ध उत्पादन में वृद्धि, ग्रामीण आय में वृद्धि और उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर दूध उपलब्ध कराना था। अंततः इसका लाभ गरीब किसानों और डेयरी सेक्टर को हुआ। विकसित भारत के निर्माण हेतु ऐसे कई ऑपरेशन फ्लड की आवश्यकता महसूस हो रही है।
दरअसल दुग्ध उत्पादन का क्षेत्र गरीब तबकों के लिए संजीवनी की तरह कार्य करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी जीने का सहारा या तो कृषि है या फिर पशुपालन! अब स्टार्टअप की दुनिया में डेयरी इंडस्ट्री खूब लाभ कमा रही है। इस इंडस्ट्री में काफी लोग रोजगार पा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सामूहिक रूप से भैंस और गाय का पालन किया जा रहा है। रोजगार और भुखमरी से जूझते भारत को समाधान प्रस्तुत कर रहा है दुग्ध उत्पादन। यदि ग्रामीण परिवार का एक सदस्य भी ठीक से जीविकोपार्जन करने लगता है तो बच्चे स्कूल जाने लगते हैं, खान-पान और पहनावा-ओढ़ावा सब बदल जाता है। अतः “घर की खुशियों का कनेक्शन जीविकोपार्जन से है, और ग्रामीण क्षेत्रों में जीविकोपार्जन का सीधा कनेक्शन कृषि एवं पशुपालन से है।
भारत में लगभग 8 से 9 करोड़ परिवार दुग्ध उत्पादन में संलग्न हैं। यदि समुदाय आधारित दुग्ध संग्रहण प्रणाली का विस्तार, डेरी समितियों का सुदृढ़ीकरण और संस्थागत संरचना के निर्माण में क़ायदे से सहायता किया जाए तो ये लोग भी बहुत समृद्ध हो सकते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में कुल दुग्ध उत्पादन का 80% भाग छोटे एवं लघु किसानों द्वारा उत्पादित किया जाता है, ऐसे किसानों के पास औसतन एक से दो दुधारू पशु होते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि पशु प्रबंधन सामूहिक हो, मशीनों का उपयोग हो, उन्नत पशु प्रजाति हो और हर्ड साईज बड़ा हो ताकि छोटे किसानों को भी बेहतरीन लाभ मिल सके। “यदि भारत के गरीब परिवार कमाई की चिंता छोड़ सपने देखने लगेंगे तो भारत के सपनों में चार चाँद लगना तय है।”
दरअसल एक पशुपालक यदि पाँच दुधारू पशु को भी पालता है तो इससे कम से कम सात से दस लोगों को रोजगार मिलता है। स्वयं पशुपालक और उनके परिवार के कुछ सदस्य रोजगार-युक्त होते हैं, दूध को खरीदने वाले को रोजगार मिलता है, इसके अलावा दूध से विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ बनाने वाले भी जीविकोपार्जन में शामिल हो जाते हैं उदहारण के लिए दूध से दही, घी, विभिन्न प्रकार की मिठाइयाँ, आइसक्रीम, बिस्किट्स और अन्य कई प्रकार के पेय पदार्थ बनाए जाते हैं। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में मानव संसाधन लगे हुए हैं। “रोजगार देने में दुग्ध उत्पादन, फसल उत्पादन को टक्कर देता है। यदि पशुधन को बीमारी मुक्त और हाईब्रिड युक्त किया जाए तो दूसरी श्वेत क्रांति लाई जा सकती है जिनसे अंततः गरीबी जड़ से खत्म की जा सकेगी।”
“नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टिट्यूट के अनुसार साल 1950-51 में भारत ने कुल 1.7 करोड़ टन दुग्ध उत्पादन किया था जबकि 2014-15 में यह आँकड़ा 14.631 करोड़ टन पहुँच गया था। खुशी की बात यह है कि साल 2021-22 में भारत में दुग्ध उत्पादन 22 करोड़ टन तक पहुँच गया है।” खाद्य और कृषि संगठन कॉर्पोरेट डेटाबेस के उत्पादन आँकड़ों के अनुसार साल 2021-22 में भारत ने दुनिया की कुल दुग्ध उत्पादन में अपना 24% योगदान देकर प्रथम स्थान हासिल किया है। इसके बावजूद भारत को प्रति पशु दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि उत्पादकता की दृष्टि से भारत विकसित देशों से काफी पीछे है। दरअसल “जितना ज़्यादा दुग्ध उत्पादन होगा गरीबी उन्मूलन की प्रक्रिया उतनी ही तेज होगी।”
वर्तमान में पशुधन का भारत के कुल जीडीपी में चार प्रतिशत से अधिक का योगदान है इसमें डेयरी सेक्टर का योगदान प्रमुख है। निम्नलिखित तरीके से भारत की गरीबी को दुग्ध उत्पादन के माध्यम से दूर की जा सकती है :
(1) आर्थिक लाभ के कार्यक्रमों के साथ गरीब ग्रामीण महिलाओं और छोटे जोत वाले किसानों को जोड़कर रोजगार उपलब्ध कराना।
(2) ग्रामीण क्षेत्र के अनुसूचित जाति / जनजाति एवं पिछड़ी जाति के लोगों को दुग्ध उत्पादन और डेयरी सेक्टर में रोजगार देना।
(3) ग्रामीण क्षेत्र में दुग्ध समितियों एवं स्वयं सेवी संस्थाओं का गठन करना ताकि आपस में समन्वय स्थापित हो सके।
(4) बिचौलिया को खत्म करना ताकि अधिक से अधिक लाभ किसानों को मिल सके।
(5) ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र के किसानों और युवाओं को पशुपालन, दुग्ध व्यवसाय व्यवस्था और चारा विकास के लिए ट्रेनिंग देना, इत्यादि।
गौरतलब है कि भारत सरकार ‘डेयरी विकास के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम’ चला रही है जिससे कि आर्थिक रूप से कमजोर किसानों की मदद हो सके। डेयरी विकास के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम का उद्देश्य दुग्ध उत्पादों की गुणवत्ता को बढ़ाना, प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन और विपणन की हिस्सेदारी को बढ़ाना है। देश में दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने के लिए ‘राष्ट्रीय पशुधन, फीड और चारा विकास पर उप-मिशन’ की शुरुआत की गई है। इसके अलावा देश में उत्पादकता में सुधार और दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए ‘राष्ट्रीय गोकुल मिशन’ चलाया जा रहा है। “पशुपालन अवसंरचना विकास कोष के तहत कुल 213 परियोजनाएँ स्थापित की गई हैं, इसके माध्यम से साल 2020-21 से अब तक लगभग 24 हजार लोगों को प्रत्यक्ष और एक लाख किसानों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला है।” इन सब योजनाओं का सकारात्मक प्रभाव गरीबी उन्मूलन पर पड़ रहा है। केंद्र सरकार पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय का बजट भी बढ़ा रही है। जहां साल 2004-2014 के बीच लगभग 18 हजार करोड़ रूपये का बजट इस सेक्टर को मिलता था वहीं 2014 से अब तक लगभग 34 हजार करोड़ रूपये का बजट प्रति साल मिल रहा है। यानी सरकार आश्वस्त है कि गरीबी को जड़ से खत्म करने में दुग्ध उत्पादन एवं डेयरी क्षेत्र को ठीक से बढ़ावा देना होगा।
भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की अन्य अर्थव्यवस्थाओं से इसलिए ज्यादा टिकाऊ है क्योंकि हमारे यहाँ एक तरफ खुदका बड़ा बाजार है तो दूसरी तरफ उस बाजार की पूर्ति के लिए उर्वर ज़मीन, पशुधन, उद्योग-धंधे और कार्य के अनुकूल कौशल प्राप्त कर रहे मानव संसाधन हैं। यदि हम अपनी माँग की पूर्ण पूर्ति खुदसे करने लगे और ठीक-ठाक निर्यात भी करने की स्थिति में रहे तो कई दृष्टिकोणों से आत्मनिर्भर हुआ जा सकेगा। क्षेत्रीय, राज्य स्तरीय, राष्ट्रीय और उसके बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दुग्ध से संबंधित खाद्य पदार्थों का निर्यात की तरफ देखना समय की माँग है। इससे न केवल भारत की गरीबी का उन्मूलन होगा बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था भी रफ़्तार पकड़ेगी।
अतः वर्तमान में दुग्ध उत्पादन डेयरी उद्योग का लाभकारी व्यवसाय बन गया है। “भारत में पशुधन अर्थव्यवस्था में योगदान के अलावा 8 करोड़ से ज्यादा ग्रामीण परिवारों को आजीविका उपलब्ध कराने में प्रमुख भूमिका निभाता है।” दुग्ध उत्पादन और डेयरी सेक्टर रोजगार के अवसर देते हैं। पशुपालक दूध और उनसे बने उत्पादों को बेचकर गुजर-बसर करते हैं। आजकल तो दूध से जुड़े उत्पादों को बनाने वाली बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियाँ भी हैं, इनमें प्रसंस्करण का काम बहुत तेजी से किया जाता है। इन फैक्ट्रियों में लाखों की संख्या में लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। अतः “दूध केवल शरीर के लिए नहीं बल्कि टिकाऊ अर्थव्यवस्था के लिए भी जरूरी है। इससे केवल शरीर मजबूत नहीं होता है बल्कि गरीब लोगों की तिजोरी भी भरती है।” टिकाऊ विकास के लिए गरीबी उन्मूलन की प्रासंगिकता बरकरार रहेगी। गरीबी उन्मूलन के लिए दुग्ध उत्पादन की प्रासंगिकता को ख़ारिज करना बेईमानी होगी।
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