हाथ से बने स्वेटर्स की वो महक और गर्मी
« »08-Jan-2024 | संजय श्रीवास्तव
जाडे़ की एक खूबसूरती ये भी है कि मौसम ठंडा होता है और रंग-बिंरंगे स्मार्ट गर्म कपड़े निकलना शुरू कर देते हैं. वाकई जाड़ों में ये कपड़े गर्मी के साथ खूबसूरती भी देते हैं. एक जमाना था जब तकनीक नहीं थी. फैशन के अंदाज भी ऐसे नहीं थे तब हाथ से बने स्वेटर जो अहसास और भावनाओं की गर्मी भी साथ में देते थे, वो तो महसूस करने वाली चीज होती थी.
तो ठंड जारी है. यकीनन आप सभी लोग ठंड में स्वेटर्स और जैकेट के टोपियों का आनंद ले रहे होंगे. लेकिन ये सब ज्यादातर बड़े बड़े ब्रांड्स होंगे या मशीन के बने होंगे. हालांकि जब भी ठंड होती है तो मेरे जो स्वेटर निकलते हैं वो कम से कम 20-30 साल पुराने तो होंगे ही. इनको पहनने के बाद जाड़ों में ठंड का सामना करने का जो आत्मविश्वास आता है वो तो अपनी जगह है लेकिन इसके अहसास शब्दों से परे होते हैं. इनमें डिजाइन होती है, मेहनत और प्यार भी. कभी कभी लगता भी है कि किसी जमाने में खूब बनने वाले हाथ के ये स्वेटर गायब होते जा रहे हैं.
वैसे आपको ये बताऊं कि मेरे पास हाथ से बने कई स्वेटर हैं, जो किसी अमूल्य धरोहर की तरह हैं. जब उन्हें पहनता हूं तो दिमाग में तमाम चित्र भी घूमने लगते हैं - किस तरह मां जाड़ा आने से पहले तरह-तरह के ऊन खरीदकर लाती थीं. फिर पूरे सीजन में कई स्वेटर हम भाई-बहनों के लिए तैयार हो जाते थे. उन्होंने जिंदगीभर में ना जाने स्वेटर बनाए होंगे. तरह तरह की डिजाइन और रंगों वाले. मुलायमियत से भरपूर. जाड़ों में घर में आने वाले नन्हें मेहमानों का स्वागत इन प्यार भरे स्वेटर के साथ होता था.
यादों के गलियारे में जाड़ों की गुनगुनी धूप के साथ मां द्वारा बुने जाते हुए कितने चित्र हर जाड़े में रिफ्रेश होकर घूम जाते हैं. मंडली में बैठी महिलाएं तब जाड़े में कुर्सियां डालकर बैठती थीं तो बुनाई के टिप्स सीखती और बताती थीं. ऊन की बुनाई परिवारों में किसी परंपरा की तरह होती थी, जो अब करीब करीब लुप्त जैसी ही है. जब स्कूल में पढ़ता था तो रेडिमेड स्वेटर इसलिए आकर्षक लगते थे क्योंकि बाजार में बिकते थे, मशीनों के होते थे. अब समझ में आता है कि हाथ से बनाए स्वेटर्स के आगे उनकी क्या कीमत. उनमें कहां वो भावनाएं, प्यार, ममता और हुनर.
मैं ही नहीं बल्कि ज्यादातर लोगों के पास मां, दादियों-नानियों और परिवार की महिलाओं के ऊन बुनाई के बहुत के किस्से और यादें होंगी. तब जाड़े आते ही दुकानें ऊन के रंगबिरंगे गोलों से अटने लगती थीं. ..और वो दुकानें खरीददारी करने वाली महिलाओं से. अब जाड़ों के साथ ऊन की दुकानें उस तरह गुलजार नहीं होतीं.
तब ठंड की पदचाप के साथ ही पत्रिकाओं के बीच बुनाई विशेषांक निकालने की होड़ लग जाती थी. मनोरमा से लेकर सरिता और गृहशोभा तक. अब तो खैर पत्रिकाएं भी कहां रहीं. पत्रिकाओं का जमाना गया और बुनाई लुप्त होते जाने के कारण बुनाई विशेषकों का भी.
इतिहास बताता है कि नीडल यानि सलाइयों के साथ हाथ की बुनाई की शुरुआत तीसरे से पांचवीं सदी के बीच मिस्र या मध्य पूर्व के देशों में हुई. तब सूती धागों का इस्तेमाल से कपड़े बनाए जाते रहे होंगे. हालांकि ऊन की खोज भी ईसा से पहले ही हो चुकी थी. वर्जिन मेरी के बहुत से चित्रों में वह हाथ में नीडल लिए हुए बुनाई करती नजर आती हैं. मध्य पूर्व से व्यापारी जब यूरोप की ओर गए तो बुनाई और खासकर ऊन की बुनाई साथ ले गए. सोचकर देखिएगा दुनिया के लिए सबसे अमूल्य काम इन व्यापारियों ने किया. खाने के पकवानों से लेकर जीवन जीने में काम आने वाली तमाम सुविधाओं को दुनिया में एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचाया. हालांकि इन्हीं व्यापारियों के जरिए उपनिवेशवाद जैसे लालच और स्वार्थ की फितरत भी फैली, जिसका दंश लंबे समय तक आधी से ज्यादा दुनिया ने झेला. मध्य पूर्व से व्यापारी अगर ऊन और बुनाई को यूरोप ले गए तो यूरोपीय जहाजियों ने इसे इसे अमेरिका से लेकर एशिया तक पहुंचाया.
दुनियाभर में 1000 से कहीं ज्यादा ब्रीड्स की भेड़ों से ऊन निकाले जाते हैं. सबसे बेहतरीन ऊन मेरिनो भेड़ से निकाले जाते हैं. ये मेरिनो भेड़ें स्पेन में पाईं जाती थीं. बताया जाता है कि वहां के राजा ने जब हालैंड को गिफ्ट में 06 भेड़ें दीं तो ये मेरिनो भेड़ें दुनिया में वहां से कई जगह गईं. अब दुनिया का 80 फीसदी मेरिनो ऊन का उत्पादन आस्ट्रेलिया करता है.
वैसे आप को बता दें कि दुनिया का सबसे महंगा फोन ऊंट जैसे दिखने वाले एक एनीमल विकुना का होता है. ये दक्षिण अमेरिका में पाया जाता है. अमेजिंग प्लैनेट वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार विकुना का 1 किलो ऊन 31 हजार रुपये से लेकर 46 हजार रुपये तक बिकता है. सिर्फ 4 टन ऊन को यूनाइटेड स्टेट्स, जर्मनी, इंग्लैंड और इटली में एक्सपोर्ट किया जाता है.
भारत में ऊन की बुनाई ब्रिटेन से आई ईसाई मिशनरीज लेकर आईं. इस कला को स्कूलों के जरिए फैलाया. बहुत जल्दी ये महिलाओं के बीच लोकप्रिय हो गई. रिसर्च कहती है 40-50 के दशक तक हाथ से बने स्वेटर दुनियाभर में फैशन स्टाइल होते थे. उनकी बहुत डिमांड थी. उसके बाद मशीनी सिलाई से बने रेडिमेड स्वेटर हिट होने लगे. वैसे पुरातत्व में मिले अवशेष तस्दीक करते हैं कि सबसे पहले ऊन से बुनाई का काम मिस्र में हुआ. इसका इस्तेमाल जुराब और दस्तानों को बनाने में हुआ. बाद में ठंड में पहने जाने वाले स्वेटर जहाजियों और नाविकों के लिए बनाए गए. जो ठंड आदि का सामना करते हुए दुनियाभर में अभियान के लिए निकलते थे.
स्वेटर बुनने से महिलाओं की सेहत को भी कुछ फायदे होते हैं. लखनऊ ऑर्थोपेडिक्स एक्सपर्ट बताते हैं, ''स्वेटर बुनते वक्त महिलाओं की उंगलियों में जो मूवमेंट होते हैं वो एक एक्सरसाइज की तरह होते हैं जो उनकी सेहत के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं.
साइकोलॉजिस्ट कहते हैं, ''स्वेटर बुनने से महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भी काफी अच्छा प्रभाव पड़ता है. स्वेटर बुनते समय वे दूसरी महिलाओं के साथ जो हंसी ठिठोली करती हैं उससे उनके अंदर डोपामाइन और सिरोटोनिन हॉर्मोन का संचार होता है, जिन्हें हैप्पीनेस हॉर्मोन कहते हैं.''
बुनाई सूत के फंदों को समान या अन्य धागों के फंदों के साथ जोड़कर कपड़ा बनाने की एक विधि है. बुनाई से टांके बनते हैं. आमतौर पर बुनाई की सुई पर एक समय में कई सक्रिय टांके होते हैं. कई अध्ययनों से ये भी पता चला कि हाथ से बुनाई की लयबद्ध और दोहराव वाली क्रिया तनाव, दर्द और अवसाद को रोकने में मदद कर सकती है, जो बदले में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करती है. जो रक्तचाप को कम कर सकती है. ये हृदय गति और कई बीमारियों को रोकने में मदद करता है और नेचर को शांत और रिलैक्स करता है. दर्द विशेषज्ञों ने ये भी पाया है कि हाथ से बुनाई करने से मस्तिष्क रसायन बदल जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप "फील गुड" हार्मोन (यानी सेरोटोनिन और डोपामाइन ) में वृद्धि होती है. तनाव हार्मोन में कमी आती है. बुनाई कहीं भी की जा सकती है. कुछ महिलाओं को अब भी इसका शौक है लेकिन ज़्यादातर महिलाओं को नहीं रहा.
इसके अलावा किसी काम में लगे रहने के कारण उनका ध्यान बंटा रहता है, जिससे उनमें तनाव, अवसाद, घबराहट जैसी चीज़ें कम होती हैं. इसके अलावा जब उनके बुने स्वेटर की कोई तारीफ करता है तो भी उनके अंदर एक सकारात्मक भावना आती है, जो उनका आत्मविश्वास मज़बूत करती है. धूप में बैठकर स्वेटर बिनने से महिलाओं के लिए सबसे ज़रूरी विटामिन यानि विटामिन डी भी उन्हें अच्छी मात्रा में मिल जाता है.
ऊन के बुनाई की कला और स्वेटर बनाने की कला आमतौर पर दुनिया में 14वीं सदी में व्यापक तौर पर ज्यादा फैली. यूरोप में हालांकि शुरू में ऊन के स्वेटर पहनना स्टेटस सिंबल था.केवल राजघराने ही उसे पहना करते थे. ऐसा जिक्र मिलता है कि स्पेन के रजवाड़े ऊन के स्वेटर बुनवाने के लिए मिस्र से मुस्लिम कारीगर रखते थे. स्पेन और इटली से ऊन की बुनाई स्काटलैंड होते हुए इंग्लैंड पहुंची. 15वीं या 16वीं सदी में यूरोपीय जहाजी इसे लातीनी अमेरिकी देशों में ले गए. 20वीं सदी के पहले दशक में भारत में ऊन की बुनाई सीमित तौर पर शुरू हो चुकी थी.
ट्रिब्यून में प्रकाशित एक लेख में कहा गया कि 19वीं सदी में पंजाब और कमोवेश भारत के लोगों में कड़ाके की ठंड में भी स्वेटर पहनने की आदत नहीं थी. तब पश्मीना के शाल और खेस ज्यादा लपेटे जाते थे. ठंड में हाथ से बने मोटे खद्दर के कपड़ों का रिवाज ज्यादा था. 1920-30 के दशक में घर में हाथ से
स्वेटर बनाए जाने लगे. उन्हें पहना जाना शुरू हो गया.
सच कहूं तो अब लगता है कि हाथ से बनाए स्वेटरों की महक और स्पर्श दोनों अलग ही होती है लेकिन दुख यही है कि बदलते समय के साथ ये कला लुप्त ही हो रही है. दुकानदारों की मानें तो ऊन की बिक्री में 60 से 70 फीसद कमी आ चुकी है. रेडिमेड गर्म कपड़े ज्यादा बिकने लगे हैं.
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