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मिशन चंद्रयान-3

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  03-Aug-2023 | अजय प्रताप तिवारी



बचपन से जवानी की दहलीज लाँघने तक जो चीज इंसान को सबसे ज्यादा लुभाती है, उनमें से एक चाँद है। चाँद हमेशा से मनुष्य की कल्पनाओं के केंद्र में रहा है। नानी के किस्से और माँ की कहानियाँ चाँद के आँगन में जवान होती थी। चाँद की चाँदनी पर न जाने कितना साहित्य लिखा जा चुका है। चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है जो सूर्य के बाद पृथ्वी से इतने साफ और बड़े आकार में दिखाई देता है। चंद्रमा की पाक्षिक कलाएँ तो और भी मनोहारी एवं जिज्ञासा उत्पन्न करने वाली हैं। यही कारण है कि मनुष्य अपनी कल्पनाओं में ही सही लेकिन यदा-कदा चाँद की सैर कर ही आता है। इंसान कल्पनाओं की दीवार गिराकर चाँद को छूना चाहता है। चाँद हमेशा से इंसानों के कोतूहल का विषय रहा है। चाँद को लेकर वैज्ञानिक और पूरी मानव जाति जिज्ञासु रही है। मानव जाति को चाँद से प्रत्यक्ष साक्षात्कार कराने का बीड़ा हमारे देश के वैज्ञानिकों ने उठाया तथा चंद्रमा पर मिशन भेजने का निर्णय लिया। चंद्रमा पर मिशन भेजने का पहला प्रयास 22 अक्टूबर, 2008 को पीएसएलवी सी-11 ध्रुवीय प्रक्षेपण यान द्वारा चंद्रयान-प्रथम को भेज कर किया गया। चंद्रयान-प्रथम 312 दिनों तक कार्यशील रहा। चंद्रयान-प्रथम ने चंद्रमा पर बर्फ के रूप में पानी जमा होने की खोज की। इसने वैज्ञानिकों और दुनिया का ध्यान बार फिर अपनी ओर खींचा। चाँद के रहस्यों से पर्दा उठाने और चाँद के विषय में और जानकारी जुटाने के लिए वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-2 लॉन्च किया । चंद्रयान-2 का प्रक्षेपण पीएसएलवी मार्क-3 एम 1 के द्वारा किया गया। चंद्रयान-2 का उद्देश्य चंद्रमा की सतह की संरचना, रासायनिक खनिजों, भूकंपन, ताप का अध्ययन करना था। तकनीकी कारण से चंद्रयान-2 के लैंडर और रोवर से संपर्क टूट गया, फिर भी, अपने मौजूदा स्वरूप में चंद्रयान-2 मिशन महत्त्वपूर्ण एवं लाभदायक सिद्ध हुआ। चाँद के विषय में और पुष्ट जानकारी प्राप्त करने हेतु चंद्रयान मिशन की तीसरी कड़ी चंद्रयान-3 लॉन्च किया गया। चंद्रयान-3 ने 14 जुलाई, 2023 को भारतीय समय के अनुसार 2 बजकर पैंतीस मिनट पर एलवीएम3एम4 प्रक्षेपण रॉकेट से उड़ान भरी। 3,900 किलोग्राम वजनी चंद्रयान-3 केवल अत्याधुनिक पेलोड्स को ले गया अपितु 130 करोड़ भारतीयों की उम्मीदें एवं शुभकामनाएँ भी इसके साथ उड़ान भर रही हैं। एलवीएम3 के उड़ान भरने के लगभग 16 मिनट पश्चात् प्रक्षेपण रॉकेट इसे एक दीर्घवृत्ताकार पार्किंग कक्ष में स्थापित करेगा जिसका परिक्रमण पथ 260×41, 602 किमी.है। यहाँ से दीर्घ वृताकर कक्षा में बढ़ते हुए चंद्रमा की परिक्रमण कक्षा में पहुँचाया जायेगा। उसके चंद्रयान-3 के प्रोपल्शन सिस्टम को चालू किया जायेगा। पुन: एक बार चंद्रमा की परिक्रमण कक्षा को घटाते हुए इसे चंद्रमा के इर्द-गिर्द 100×100 किमी. की दीर्घ वृताकर कक्षा में स्थापित किया जायेगा। दूसरे चरण में जब प्रोपल्शन सिस्टम लैंडर-रोवर से अलग हो जाएगा, उसके बाद चंद्रयान-3 की गति को कम हो जाएगी व दिशा बदला जायेगी। लैंडर और रोवर को चंद्रमा की 100X30 किमी. की कक्षा में लाया जायेगा। इस हेतु 23 अगस्त का दिन निर्धारित किया गया है। चंद्रयान-3 चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग का दूसरा प्रयास है। चंद्रयान-3 में कई बदलाव किए गए हैं। लैंडर में चारों तरफ सौर पैनल लगाए गए हैं। लैंडर और रोवर चाँद की सतह का अध्ययन कर पानी और खनिज की तलाश करेंगे। चाँद पर भूकंप आते हैं या नहीं इस मिशन से यह भी पता लगाया जाएगा। चंद्रमा पर जानकारी इकट्ठा कर रोवर उसे लैंडर को भेजेगा और लैंडर का काम उस जानकारी को इसरो तक पहुँचाना है। यदि चंद्रयान-3 मिशन सफल रहा तो भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद दुनिया का चौथा देश होगा- चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिग कराने वाला। चंद्रयान-3 के संक्षिप्त घटनाक्रम पर दृष्टि डालने के उपरांत समझते हैं कि चंद्रयान-3 को चंद्रमा पर भेजने का मूल उद्देश्य क्या था? चंद्रयान-3 मिशन का उद्देश्य चंद्रमा की संरचना को बेहतर ढंग से समझना है। इस मिशन के तीन मुख्य उद्देश्य निर्धारित किए हैं, जो इस प्रकार हैं-

1.चंद्रमा की सतह पर एक सुरक्षित और सॉफ्ट लैंडिंग का प्रदर्शन करना।
2.चंद्रमा पर रोवर की घूमने की क्षमताओं का प्रदर्शन करना।
3.यथास्थान वैज्ञानिक प्रयोगों का संचालन करना।

चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंडिंग का क्या है महत्त्व:

मानव सभ्यता के शुरुआती दौर से चंद्रमा और मानव के बीच संबंध बना है। यही कारण है कि चंद्रमा के प्रत्येक हिस्से को जानने और समझने की जिज्ञासा मनुष्यों की सदियों से रही है। चंद्रमा पर दो ध्रुव हैं- उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उत्तरी ध्रुव के अपेक्षा संसाधन उपलब्ध होने की संभावना अधिक है। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की सतह पर ऐसे गड्ढे हैं जो अपने तरीके से अनोखे हैं, क्योंकि सूरज की रोशनी उनके अंदरूनी हिस्सों तक नहीं पहुँचा पाती है। दक्षिणी ध्रुव पर कई परिवर्तनकारी रहस्य छुपे हुए हैं जो निकट भविष्य में अंतरिक्ष शोध को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए शोध के दृष्टि से दक्षिणी ध्रुव महत्त्वपूर्ण है। मिशन चंद्रयान-3 से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की खोज से प्राप्त आंकड़े और नतीजे वैश्विक वैज्ञानिकों के लिए बहुत ही लाभदायक सिद्ध होंगे ।

मिशन चंद्रयान-3 के लाभ :

चंद्रयान-3 चंद्रमा की संरचना, भू-विज्ञान और इसके इतिहास के नए रहस्यों को उजागर करने वाला है। चंद्रयान-3 न केवल भारत के लिए बल्कि विश्व के वैज्ञानिक समुदाय के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह भारतीय वैज्ञानिकों की क्षमता और तकनीकी कौशल का वैश्विक प्रदर्शन है। साथ ही, भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा भी है। चंद्रयान-3 से भारत के खगोलीय ज्ञान में वृद्धि होगी। साथ ही, हम खगोलीय पिंडों एवं उनकी क्रियाविधि का बेहतर अनुमान लगा सकने में समर्थ होंगे। स्पेस टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में और स्वदेशी स्तर पर विकसित प्रौद्योगिकी को बढ़ावा मिलेगा। भारत की अंतरिक्ष बाजार में वैश्विक स्तर पर साख बढ़ेगी। भारत वैज्ञानिक और आर्थिक के साथ राजनीतिक रूप से भी मजबूत बनेगा। चंद्रयान-3 जियो पॉलिटिक्स के लिहाज से भारत के लिए बहुत खास है। भविष्य में जब कभी अंतरिक्ष अधिकार को लेकर कोई समझौता होगा, तो निश्चित रूप से भारत नीति निर्माताओं की अग्रिम भूमिका में होगा। चंद्रयान-3 सैन्यीकरण के दृष्टि से भी भारत को मजबूत बनाएगा। चंद्रयान-3 से भारत की स्‍पेस इकॉनमी को लाभ होगा। एक अनुमानित आंकड़े के अनुसार भारत की स्‍पेस इकॉनमी 2020 में 9.6 अरब डॉलर की थी, इसके 2025 तक 13 अरब डॉलर हो जाने का अनुमान है। चंद्रमा के अध्ययन से पृथ्वी की संरचना और अनसुलझी गुत्थी को सुलझाने में सहायता मिलेगी।

निष्कर्ष :

21वीं सदी में वैश्विक नेतृत्व की क्षमता उनके काँधों पर होगी जो तकनीकी रूप से मजबूत होंगे। भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में महाशक्ति के रूप में उभरा है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अनुसार भारत में पिछले 10 सालों में वैज्ञानिक प्रकाशनों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है, भारत चीन और अमेरिका के बाद विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सहयोग से भारत के ज्ञान की अर्थव्यवस्था मजबूत होती नजर आ रही है। भारत वसुधैव कुटुम्बकम् में विश्वास रखता है। चंद्रयान-3 से प्राप्त जानकारी सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिए उपयोग होगी। भारत चाँद को छूने के साथ तकनीकी की दुनिया में आत्मनिर्भर होगा। अभी भारत की खोज की लालसा ख़त्म नहीं हुई है। गोपाल दास ‘नीरज’ ठीक ही कहते हैं- “चाँद को छू के चले आए हैं विज्ञान के पँख, देखना ये है कि इंसान कहाँ तक पहुँचे।”

  अजय प्रताप तिवारी  

अजय प्रताप तिवारी, यूपी के गोंडा जिले के निवासी हैं। इन्होंने विज्ञान और इतिहास में पढ़ाई करने के बाद देश के प्रतिष्ठित अखबारों और विभिन्न पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेखन कार्य किया है। इसके साथ ही इन्हें साहित्य और दर्शन में रुचि है।



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